बालक सियके बिहरत मुदित-मन दोउ भाइ I
नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुंदरताइ II १ II
देत मुनि मुनि-सिसु खेलौना, ते लै धरत दुराइ I
खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृंद बोलाइ II २ II
भूप-भूषण-बसन-बाहन, राज-साज सजाइ I
बरम-चरम, कृपान-सर, धनु-तून लेत बनाइ II ३ II
दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी सुत-सुख पाइ I
आँच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ II ४ II
भावार्थ :- सीताजीके बालक दोनों भाई प्रसन्नचित्तसे वनमें खेलते फिरते हैं I उनके नाम लव और कुश हैं, वे सुन्दरतामें भगवान श्रीराम और माता सीताजीके ही समान हैं II १ II वाल्मीकि मुनि जब उन्हें मुनिबालकोंवाले खिलौने देते हैं तो वे उन्हें लेकर छिपाकर रख देते हैं I वे बहुत-से बालकोंको बुलाकर राजकुमारोंके-से खेल खेलते हैं II २ II वे राजाओंके-से आभूषण, वस्त्र, वाहन और राजसामग्री सजाते हैं तथा कवच, ढाल, तलवार, बाण, धनुष और तरकस भी बना लेते हैं II ३ II तुलसीदासजी कहते हैं- सीताजी पति (भगवान श्रीराम)- के वियोगमें तो दुःखी हैं, किंतु पुत्र-सुख पाकर प्रसन्न भी हैं, जिस प्रकार अग्नि पर रखा हुआ दूध उफनने लगता है, परंतु जलके छींटे लगते ही फिर बैठ जाता है II ४ II
नाम लव-कुस राम-सिय अनुहरति सुंदरताइ II १ II
देत मुनि मुनि-सिसु खेलौना, ते लै धरत दुराइ I
खेल खेलत नृप-सिसुन्हके बालबृंद बोलाइ II २ II
भूप-भूषण-बसन-बाहन, राज-साज सजाइ I
बरम-चरम, कृपान-सर, धनु-तून लेत बनाइ II ३ II
दुखी सिय पिय-बिरह तुलसी, सुखी सुत-सुख पाइ I
आँच पय उफनात सींचत सलिल ज्यों सकुचाइ II ४ II
भावार्थ :- सीताजीके बालक दोनों भाई प्रसन्नचित्तसे वनमें खेलते फिरते हैं I उनके नाम लव और कुश हैं, वे सुन्दरतामें भगवान श्रीराम और माता सीताजीके ही समान हैं II १ II वाल्मीकि मुनि जब उन्हें मुनिबालकोंवाले खिलौने देते हैं तो वे उन्हें लेकर छिपाकर रख देते हैं I वे बहुत-से बालकोंको बुलाकर राजकुमारोंके-से खेल खेलते हैं II २ II वे राजाओंके-से आभूषण, वस्त्र, वाहन और राजसामग्री सजाते हैं तथा कवच, ढाल, तलवार, बाण, धनुष और तरकस भी बना लेते हैं II ३ II तुलसीदासजी कहते हैं- सीताजी पति (भगवान श्रीराम)- के वियोगमें तो दुःखी हैं, किंतु पुत्र-सुख पाकर प्रसन्न भी हैं, जिस प्रकार अग्नि पर रखा हुआ दूध उफनने लगता है, परंतु जलके छींटे लगते ही फिर बैठ जाता है II ४ II
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