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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

Blog Archive

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Monday, 30 November 2015

गोस्वामी तुलसीदास विरचित हनुमान चालीसा

जै जै जै हनुमान गोसाईं I कृपा करहु गुरु देव की नाईं II ३७ II
भावार्थ :- हे हनुमान स्वामी ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! आप गुरुदेवकी भाँति मेरे ऊपर कृपा कीजिये I
"मेरे आराध्य देव बजरंग बली"
{My Guru and God (Ishta Dev) is Bajrang Bali}

Friday, 27 November 2015

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीहनुमान चालीसा

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीहनुमान चालीसा :-
भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै II २४ II
भावार्थ :- भूत-पिशाच आदि आपका 'महावीर' नाम सुनते ही (नामोच्चारण करनेवालेके) समीप नहीं आते हैं I
व्याख्या :- 'बजरंगबली' का नाम लेनेमात्रसे भूत-पिशाच भाग जाते हैं तथा भूत-प्रेत आदिकी बाधा मनुष्यके पास भी नहीं आ सकती I श्रीहनुमानजीका नाम लेते ही सारे भय दूर हो जाते हैं I

Thursday, 5 November 2015

गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्रीहनुमान चालीसा

तुम्हरे भजन राम को पावै I जनम जनम के दुख बिसरावै II ३३ II
अंत काल रघुबर पुर जाई I जहाँ जन्म हरि−भक्त कहाई II ३४ II
भावार्थ :- हे सीताराम भक्त हनुमानजी ! आपके भजनसे लोग भगवान श्रीरामको प्राप्त कर लेते हैं और अपने जन्म-जन्मान्तरके दुःखोंको भूल जाते हैं अर्थात उन दुःखोंसे उन्हें मुक्ति मिल जाती है II ३३ II  अन्त समयमें मृत्यु होनेपर वह भक्त प्रभुके परमधाम (साकेत−धाम) जायगा और यदि उसे जन्म लेना पड़ा तो उसकी प्रसिद्धि हरिभक्तके रूपमें हो जायगी II ३४ II

Saturday, 24 October 2015

श्रीहनुमान चालीसा (गोस्वामी तुलसीदासजी विरचित)

चारों जुग परताप तुम्हारा I है परसिद्ध जगत उजियारा II २९ II
भावार्थ:- हे हनुमानजी ! चारों युगों (सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग)- में आपका प्रताप जगतको सदैव प्रकाशित करता चला आया है - ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है I अर्थात् चारो युगों-सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग (तीनो लोक-स्वर्गलोक, भूलोक और पाताललोक तथा तीनो काल-भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल)- में आपका यश फैला हुआ है, जगतमें आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है ।

व्याख्या:-
सतयुग:- सतयुगमें पवनपुत्र भगवान शंकरके स्वरूप से विश्वमें स्थित थे, तभी तो उन्हें शिवस्वरूप (ग्यारह रुद्रावतारोंमें से एक) लिखा और कहा गया है I गोस्वामी तुलसीदासजीने हनुमान चालीसामें उन्हें शंकर-सुवन केसरी-नंदन कहकर संबोधित किया है । अत: यह प्रमाणित है कि श्रीहनुमानजी सतयुगमें शिवरूपमें थे और कपालधारी शिव-शंकर तो अजर-अमर हैं ।

त्रेतायुग:- त्रेतायुगमें पवनपुत्र हनुमानजीने केसरी-नंदन और अंजनी-पुत्रके रूपमें जन्म लिया और वे भगवान श्रीरामके दास्य-भावसे परम-भक्त बनकर उनके साथ छायाकी तरह रहे । श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, सीता, सुग्रीव, विभीषण और संपूर्ण कपि-मंडल, कोई भी उनके ऋणसे मुक्त अर्थात उऋण नहीं हो सकता । इस प्रकार त्रेतायुगमें हनुमानजी साक्षात विराजमान हैं । इनके बिना तो संपूर्ण रामायण चरित्र पूर्ण होता ही नहीं ।

द्वापरयुग:- द्वापरयुगमें हनुमानजी भीम (पवनदेवके पुत्र और पांच पाण्डवोंमें से एक- इसलिये रिश्तेमें भीम पवनपुत्र हनुमानजीके भाई हुए)- की परीक्षा लेते हैं । महाभारतमें प्रसंग हैं कि भीम उनकी पूंछको मार्ग से हटानेके लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूछ नहीं हटा पाते हैं । दूसरे हनुमानजी और अर्जुनके प्रसंग अनुसार भगवान श्रीकृष्णके कहने पर श्रीहनुमानजी महाभारतके युद्धमें अर्जुनके रथके ऊपर ध्वजा लिए विराजित रहते हैं अर्थात ध्वजामें उनका वास रहता हैं ।

कलियुग:- कलियुगमें जहां-जहां भगवान श्रीरामकी कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां श्रीहनुमानजी गुप्त रूपसे विराजमान रहते हैं । 16वीं सदीके महान संत कवि तुलसीदासजीको हनुमानजीकी कृपासे ही भगवान श्रीराम और लक्ष्मणजीके दर्शन प्राप्त हुए ।

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानसके सुंदरकाण्डमें सीताजीके वचनोंके अनुसार-
अजर अमर गुननिधि सुत होहू । करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
अर्थात:- हे पुत्र हनुमान ! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके खजाने होओ । श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करें ।

हनुमानजीको भगवान श्रीरामसे यह वरदान मिला है की अनेक जगह पे एक साथ रामायण श्रवण करनेके लिए अनेक शरीर धारण कर सकोंगे और जब तक इस जगतमें रामायणकी कथा होती रहेगी तुम जीवित रहोंगे अर्थात चिरंजीवी रहोंगे I

श्लोक:- 'अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥'
अर्थात्:- अश्वत्थामा, बलि, व्यास, भगवान हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ये सभी चिरंजीवी हैं ।

महिमा :- इस कलियुगमें एक हनुमानजी ही सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात देव हैं ।

Friday, 9 October 2015

गोस्वामी तुलसीदास विरचित हनुमान चालीसा

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया I राम लखन सीता मन बसिया II ८ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! आप प्रभु श्रीराघवेन्द्रका  चरित्र (उनकी पवित्र मंगलमयी रामायणकी कथा) सुननेके लिये सदा लालायित और उत्सुक (कथारसके आनंदमें निमग्न) रहते हैं I भगवान श्रीराम भगवती सीता और लक्ष्मण जति सदा आपके मनमंदिरमें विराजमान रहते हैं I

Tuesday, 29 September 2015

गोस्वामी तुलसीदास लिखित श्रीहनुमान चालीसा

गोस्वामी तुलसीदास लिखित श्रीहनुमान चालीसा :-
तुम्हरे भजन राम को पावै I जनम जनम के दुख बिसरावै II ३३ II
अंत काल रघुबर पुर जाई I जहाँ जन्म हरि−भक्त कहाई II ३४ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! आपके भजनसे लोग भगवान श्रीरामको प्राप्त कर लेते हैं और अपने जन्म-जन्मान्तरके दुःखोंको भूल जाते हैं अर्थात उन दुःखोंसे उन्हें मुक्ति मिल जाती है I अन्त समयमें मृत्यु होनेपर वह भक्त प्रभुके परमधाम (साकेत−धाम) जायगा और यदि उसे जन्म लेना पड़ा तो उसकी प्रसिद्धि हरिभक्तके रूपमें हो जायगी I

Wednesday, 16 September 2015

श्रीहनुमान चालीसा {गोस्वामी तुलसीदास रचित}

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया I राम लखन सीता मन बसिया II ८ II
भावार्थ :- आप भगवान श्रीरामका चरित्र (उनकी पवित्र मंगलमयी कथा रामायण) सुननेके लिये सदा लालायित और उत्सुक (कथारसके आनंदमें निमग्न) रहते हैं I प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण जति और माता सीताजी सदा आपके हृदयमें विराजमान रहते हैं I

Monday, 7 September 2015

गोस्वामी तुलसीदास लिखित हनुमान चालीसा

राम रसायन तुम्हरे पासा I सदा रहो रघुपति के दासा II ३२ II
भावार्थ :- हे रामभक्त हनुमानजी ! अनन्त कालसे आप भगवान श्रीरामके दास हैं I अतः रामनामरूपी रसायन (भवरोगकी अमोघ औषधि) सदा आपके पास रहती हैं I

Friday, 21 August 2015

हनुमान चालीसा_गोस्वामी तुलसीदास

राम दुआरे तुम रखवारे I होत न आज्ञा बिनु पैसारे II २१ II
भावार्थ :- हे परमवीर हनुमाना ! भगवान श्रीरामचन्द्रजीके द्वारके रखवाले (द्वारपाल) आप ही हैं I आपकी आज्ञाके बिना उनके दरबारमें किसीका प्रवेश नहीं हो सकता (अर्थात भगवान श्रीरामकी कृपा और भक्ति प्राप्त करनेके लिये आपकी कृपा बहुत आवश्यक है ) I

Thursday, 13 August 2015

हनुमान चालीसा (गोस्वामी तुलसीदास)

संकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग बंदन II ६ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! आप कपालधारी भगवान शंकरके अंश-अवतार (ग्यारह वा रुद्रावतार) और वानरराज केशरीके पुत्रके नामसे विख्यात हैं I आप (अतिशय) तेजस्वी, महान प्रतापी और समस्त जगतके वंदनीय हैं I

Thursday, 6 August 2015

गोस्वामी तुलसीदास लिखित श्रीहनुमान चालीसा

जै जै जै हनुमान गोसाईं I कृपा करहु गुरु देव की नाईं II ३७ II
भावार्थ :- हे श्रीहनुमान स्वामी ! आपकी जय हो ! जय हो !! जय हो !!! आप गुरुदेवकी भाँति मेरे ऊपर कृपा कीजिये I
"मेरे आराध्य देव बजरंग बली"
(My Guru and God (Ishta Dev) is Bajrang Bali)

Friday, 24 July 2015

हनुमान चालीसा {गोस्वामी तुलसीदास}

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई I तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई II १२ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! भगवान श्रीराघवेन्द्र सरकारने आपकी बड़ी प्रशंसा की I उन्होनें कहा कि तुम भाई भरतके समान ही मेरे प्रिय हो I

Monday, 20 July 2015

गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीहनुमान चालीसा

तुम्हरे भजन राम को पावै I जनम जनम के दुख बिसरावै II ३३ II
अंत काल रघुबर पुर जाई I जहाँ जन्म हरि−भक्त कहाई II ३४ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! आपके भजनसे लोग भगवान श्रीरामको प्राप्त कर लेते हैं और अपने जन्म-जन्मान्तरके दुःखोंको भूल जाते हैं अर्थात उन दुःखोंसे उन्हें मुक्ति मिल जाती है I अन्त समयमें मृत्यु होनेपर वह भक्त प्रभुके परमधाम (साकेत−धाम) जायगा और यदि उसे जन्म लेना पड़ा तो उसकी प्रसिद्धि हरिभक्तके रूपमें हो जायगी I