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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Wednesday, 25 November 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति_श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी विरचित

जयति विश्व-विख्यात बानैत-विरूदावली, विदुष बरनत वेद विमल बानी I
दास तुलसी त्रास शमन सीतारमण संग शोभित राम-राजधानी II ९ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो I तुम विश्वमें विख्यात हो, वीरताका बाना सदा ही कसे रहते हो I विद्वान और वेद अपनी विशुद्ध वाणीसे तुम्हारी विरदावलीका वर्णन करते हैं I तुम तुलसीदासके भव-भयको नाश करनेवाले हो और अयोध्यामें सीतारमण श्रीरामजीके साथ सदा शोभायमान रहते हो II ९ II 

Sunday, 1 November 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति_गोस्वामी तुलसीदासजी कृत

जयति दशकंठ-घटकर्ण-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता I
अघटघटना-सुघट सुघट-विघटन विकट, भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता II ८ II
भावार्थ :- हे पवनपुत्र हनुमान ! तुम्हारी जय हो ! रावण, कुंभकर्ण और मेघनादके नाशमें तुम्हीं कारण हो; कपटी कालनेमिको तुम्हींने मारा था I तुम असंभवको संभव और संभवको असंभव कर दिखलानेवाले और बड़े विकट हो I पृथ्वी, पाताल, समुद्र और आकाश सभी स्थानोंमें तुम्हारी अबाधित गति है II ८ II

Thursday, 15 October 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति {गोस्वामी तुलसीदास लिखित}

जयति सौमित्रि-रघुनंदनानंदकर, ऋक्ष-कपि-कटक-संघट-विधायी I
बद्ध-वारिधि-सेतु अमर-मंगल-हेतु, भानुकुलकेतु-रण-विजयदायी II ६ II
जयति जय वज्रतनु दशन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरू-शैल-पानी I
समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, पेरि डारे सुभट घालि घानी II ७ II
भावार्थ :- तुम्हारी जय हो I तुम श्रीराम-लक्ष्मणको आनन्द देनेवाले, रीछ और बंदरोंकी सेना इकट्ठी कर समुद्रपर पुल बाँधनेवाले, देवताओंका कल्याण करनेवाले और सूर्यकुल-केतु भगवान श्रीरामको संग्राममें विजय-लाभ करानेवाले हो II ६ II तुम्हारी जय हो, जय हो I तुम्हारा शरीर, दाँत, नख और विकराल मुख वज्रके समान है I तुम्हारे भुजदण्ड बड़े ही प्रचण्ड हैं, तुम वृक्षों और पर्वतोंको हाथोंपर उठानेवाले हो I तुमने संग्रामरूपी कोल्हूमें राक्षसोंके समूह और बड़े-बड़े योद्धारुपी तिलोंको डाल-डालकर घानीकी तरह पेर डाला II ७ II

Thursday, 1 October 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति_गोस्वामी तुलसीदास रचित

जयति सुग्रीव-ऋक्षादि-रक्षण-निपुण, बालि-बलशालि-बध -मुख्यहेतू I
जलधि-लंघन सिंह सिंहिका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात-केतू II ४ II
जयति भूनन्दिनी-शोच-मोचन विपिन-दलन घननादवश विगतशंका I
लूमलीलाऽनल-ज्वालमालाकुलित होलिकाकरण लंकेश-लंका II ५ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो ! तुम वानरराज सुग्रीव तथा ऋक्षराज जाम्बवन्त आदिकी रक्षा करनेमें कुशल हो I महाबलवान बालिके मरवानेमें तुम्हीं मुख्य कारण हो I तुम्हीं समुद्र लाँघनेके समय सिंहिका राक्षसीका मर्दन करनेमें सिंहरूप तथा राक्षसोंकी लंकापुरीके लिये धूमकेतु (पुच्छल तारे)- रूप हो II ४ II तुम्हारी जय हो ! तुम श्रीसीताजीको भगवान रामका सन्देशा सुनाकर उनकी चिन्ता दूर करनेवाले और लंकेश रावणके अशोकवनको उजाड़नेवाले हो I तुमने अपनेको निःशंक होकर मेघनाद (इन्द्रजीत)- से ब्रह्मास्त्र में बँधवा लिया था तथा अपनी पूँछकी लीलासे अग्निकी धधकती हुई लपटोंसे व्याकुल हुए दशमुख रावणकी लंकामें चारों और होली जला दी थी II ५ II

Friday, 18 September 2015

विनय पत्रिका_श्रीगणेश स्तुति_गोस्वामी श्रीतुलसीदास रचित

गाइये गनपति जगबंदन I संकर-सुवन भवानी-नंदन II १ II
सिद्धि-सदन, गज-बदन, बिनायक I कृपा-सिंधु, सुंदर, सब-लायक II २ II
मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता I बिद्या-बारिधि, बुद्धि-बिधाता II ३ II
माँगत तुलसीदास कर जोरे I बसहिं रामसिय मानस मोरे II ४ II
भावार्थ :- संपूर्ण जगतके वन्दनीय, गणोंके स्वामी श्रीगणेशजीका गुणगान कीजिये, जो शिव-पार्वतीके पुत्र और उनको प्रसन्न करनेवाले हैं II १ II जो सिद्धियोंके स्थान हैं, जिनका हाथिका-सा मुख है, जो समस्त विघ्नोंके नायक हैं यानी विघ्नोंको हटानेवाले हैं, कृपाके समुद्र हैं, सुंदर हैं, सब प्रकारसे योग्य हैं  II २ II जिन्हें लड्डू बहुत प्रिय है, जो आनंद और कल्याणको देनेवाले हैं, विद्याके अथाह सागर हैं, बुद्धिके विधाता हैं II ३ II ऐसे श्रीगणेशजीसे यह तुलसीदास हाथ जोड़कर केवल यही वर माँगता है की मेरे मनमन्दिरमें (श्रीलक्ष्मणजी तथा श्रीहनुमानजी सहित) श्रीसीतारामजी सदा निवास करें  II ४ II

Tuesday, 8 September 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति (गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी लिखित)

जयत्यंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत विधु विबुध-कुल-कैरवानंदकारी I
केसरी-चारु-लोचन-चकोरक-सुखद, लोकगन-शोक-संतापहारी II १ II
जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित-चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता I
राहु-रवि-शक्र-पवि-गर्व-खर्वीकरण शरण-भयहरण जय भुवन-भर्त्ता II २ II
जयति रणधीर, रघुवीरहित, देवमणि, रूद्र-अवतार, संसार-पाता I
विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपुष, विमलगुण बुद्धि-वारिधि-विधाता II ३ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो ! तुम अंजनीके गर्भरूपी समुद्रसे चन्द्ररूप उत्पन्न होकर देव-कुलरूपी कुमुदोंको प्रफुल्लित करनेवाले हो, पिता केसरीके सुंदर नेत्ररूपी चकोरोंको आनंद देनेवाले हो और समस्त लोकोंका शोक-संताप हरनेवाले हो II १ II तुम्हारी जय हो, जय हो ! तुमने बचपनमें ही बाललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड सूर्यके मण्डलको लाल-लाल खिलौना समझकर निगल लिया था I उस समय तुमने राहु, सूर्य, इन्द्र और वज्रका गर्व चूर्ण कर दिया था I हे शरणागतके भय हरनेवाले ! हे विश्वका भरण-पोषण करनेवाले !! तुम्हारी जय हो II २ II तुम्हारी जय हो ! तुम रणमें बड़े धीर, सदा श्रीरामजीका हित करनेवाले, देव-शिरोमणी, रूद्रके अवतार और संसारके रक्षक हो I तुम्हारा शरीर ब्राह्मण, देवता, सिद्ध और मुनियोंके आशीर्वादका मूर्तिमान रूप है I तुम निर्मल गुण और बुद्धिके समुद्र तथा विधाता हो II ३ II

Sunday, 9 August 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति (गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी लिखित)

जाके गति है हनुमानकी I
ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषानकी II १ II
अघटित-घटत, सुघट-बिघटन, ऐसी बिरदावली नहीं आनकी I
सुमिरत संकट-सोच-बिमोचन, मूरति मोद-निधानकी II २ II
तापर सानुकूल, गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी I
तुलसी कपिकी कृपा-बिलोकनि, खानी सकल कल्याणकी II ३ II
भावार्थ :- जिसको (सब प्रकारसे) श्रीहनुमानजीका आश्रय है, उसकी प्रतिज्ञा पूरी हो ही गयी I यह सिद्धान्त वज्र (हीरे)- की लकीरके समान अमिट है II १ II क्योंकि श्रीहनुमानजी असंभव घटनाको संभव और संभवको अशंभव करनेवाले हैं, ऐसे यशका बाना दूसरे किसीका भी नहीं है I श्रीहनुमानजीकी आनंदमयी मूर्तिका स्मरण करते ही सारे संकट और शोक मिट जाते हैं II २ II सब प्रकारके कल्याणोंकी खानी श्रीहनुमानजीकी कृपादृष्टि जिसपर है, हे तुलसीदास ! उसपर पार्वती, शंकर, लक्ष्मण, भगवान श्रीराम और जानकीजी सदा कृपा किया करती हैं II ३ II

Wednesday, 22 July 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति (गोस्वामी तुलसीदास लिखित)

मंगल-मूरति मारुत-नंदन I सकल-अमंगल-मूल-निकंदन II १ II
पवनतनय संतन-हितकारी I हृदय बिराजत अवध-बिहारी II २ II
मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद I सिवा-समेत संभु, सुक, नारद II ३ II
चरन बंदि बिनवौं सब काहू I देहु रामपद-नेह-निबाहू II ४ II
बंदौं राम-लखन-बैदेही I जे तुलसीके परम सनेही II ५ II
भावार्थ :- पवनकुमार श्रीहनुमानजी कल्याणकी मूर्ति हैं I वे सारी बुराइयोंकी जड़ काटनेवाले हैं II १ II पवनके पुत्र हैं, संतोंका हित करनेवाले हैं I अवधविहारी भगवान श्रीराम सदा इनके हृदयमें विराजते हैं II २ II इनके तथा माता-पिता, गुरु, गणेश, सरस्वती, पार्वतीसहित शिवजी, शुकदेवजी, नारद II ३ II इन सबके चरणोंमें प्रणाम करके में यह विनती करता हूँ कि भगवान श्रीरघुनाथजीके चरण-कमलोंमें मेरा प्रेम सदा एक-सा निबह रहे, यह वरदान दीजिये II ४ II अन्तमें में भगवान श्रीराम, श्रीलक्ष्मणजी और श्रीजानकीजीको प्रणाम करता हूँ, जो तुलसीदासके परमप्रेमी (परमस्नेही) और सर्वस्व हैं II ५ II

Wednesday, 15 July 2015

विनय पत्रिका_हनुमत स्तुति (गोस्वामी तुलसीदास कृत)

जयति मर्कटाधीश, मृगराज-विक्रम, महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली I
मोह-मद-क्रोध-कामादि-खल-संकुला, घोर संसार-निशि किरणमाली II १ II
जयति लसदंजनाडदिजित, कपि-केसरी-कश्यप-प्रभव, जगदार्त्तिहर्त्ता I
लोक-लोकप-कोक-कोकनद-शोकहर, हंस हनुमान कल्याणकर्ता II २ II
भावार्थ :- हे हनुमानजी ! तुम्हारी जय हो I तुम बंदरोंके राजा, सिंहके समान पराक्रमी, देवताओंमें श्रेष्ठ, आनंद और कल्याणके स्थान तथा कपालधारी शिवजीके अवतार हो I मोह, मद, क्रोध, काम आदि दुष्टोंसे व्याप्त घोर संसाररूपी अन्धकारमयी रात्रिके नाश करनेवाले तुम साक्षात् सूर्य हो II १ II तुम्हारी जय हो I तुम्हारा जन्म अंजनीरुपी अदिति (देवमाता) और वनारोंमें सिंहके समान केसरीरूपी कश्यपसे हुआ है I तुम जगतके कष्टोंको हरनेवाले हो तथा लोक और लोकपालरूपी चकवा-चकवी और कमलोंका शोक नाश करनेवाले साक्षात् कल्याण-मूर्ति सूर्य हो II २ II