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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Monday, 2 November 2015

कवितावली_अयोध्याकाण्ड_केवटका पादप्रक्षालन {गोस्वामी तुलसीदास रचित}

एहि घाटतें थोरिक दूरि अहै कटि लौं जलु थाह दिखाइहौं जू I
परसें पगघूरि तरै तरनी, घरनी घर क्यों समुझाइहौं जू II
तुलसी अवलंबु न और कछू, लरिका केहि भाँति जिआइहौं जू I
बिना पग धोएँ हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू II
भावार्थ :- (केवट कहता है)- इस घाटसे थोड़ी ही दूरपर केवल कमरभर जल है I चलिये, मैं थाह दिखला दूँगा (मैं नावपर तो आपको ले नहीं जाऊँगा, क्योंकि यदि अहल्याके समान) आपकी चरणरजका स्पर्श कर मेरी नावका भी उद्धार हो गया तो मैं घरकी स्त्रीको कैसे समझाऊँगा ? मुझको (जीविकाके लिये) और कुछ अवलम्बन नहीं है I अतः फिर अपने बाल-बच्चोका पालन मैं किस प्रकार करूँगा ? हे नाथ ! बिना आपके चरण धोये मैं (आपको) नावपर नहीं चढ़ाऊँगा I

Wednesday, 21 October 2015

कवितावली_सुन्दरकाण्ड_सीताजीसे विदाई_श्रीमदगोस्वामी तुलसीदासजी लिखित

जारि-बारि, कै बिधूम, बारिधि बुताइ लूम, नाइ माथो पगनि, भो ठाढ़ो कर जोरि कै I
मातु ! कृपा कीजै, सहिदानि दीजै, सुनि सीय, दीन्ही है असीस चारू चूडामनि छोरि कै II
कहा कहौं तात ! देखे जात ज्यों बिहात दिन, बड़ी अवलंब ही, सो चले तुम्ह तोरि कै II
'तुलसी' सनीर नैन, नेहसो सिथिल बैन I
भावार्थ :- फिर हनुमानजीने लंकाको जलाकर उसे धूमरहित कर अपनी पूंछको समुद्रमें बूता दी, बादमें (माता सीताजीके) चरणोंमें सिर नवाया और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, (तथा कहने लगे)- 'हे माता ! कृपाकर कोई सहिदानी (चिन्ह) दीजिये I' यह सुनकर श्रीजानकीजीने आशीर्वाद दिया और अपना सुन्दर चूड़ामणि उतारकर देते हुए कहा- 'पुत्र ! मैं तुमसे क्या कहुँ ? मेरे दिन किस प्रकार कट रहे हैं, सो तो तुम देख ही रहे हो I तुम्हारे रहनेसे बड़ा सहारा था, उसे भी तुम तोड़कर अब चल दिये I' गोसाईजी कहते हैं- (इतना कहते-कहते) माता वैदेहीके नेत्रोंमें जल भर आया और वाणी शिथिल हो गयी I

Monday, 12 October 2015

कवितावली_किष्किन्धाकाण्ड_समुद्रोल्लंघन_गोस्वामी तुलसीदास रचित

जब अंगदादिनकी मति-गति मंद भई, पवनके पूतको न कूदिबेको पलु गो ।
साहसी ह्वै सैलपर सहसा सकेलि आइ, चितवत चहूँ ओर, औरनि को कलु गो II
‘तुलसी’ रसातल को निकसि सलिलु आयो, कालु कलमल्यो, अहि-कमठको बलु गो ।
चारिहू चरन के चपेट चाँपें चिपिटि गो, उचकें उचकि चारि अंगुल अचलु गो II
भावार्थ :- जब अंगदादि वानरोंकी गति और बुद्धि मंद पड़ गयी (अर्थात किसीने (१०० योजन अपार समुद्रके) पार जाना स्वीकार नहीं किया) तब वायुकुमार हनुमानजीको (४०० कोस महासागर) कुदनेमें पलमात्रकी भी देरी नहीं हुई I वे साहसपूर्वक सहसा कौतुक से ही पर्वत पर आ चारों और देखने लगे I इससे शत्रुओंकी शान्ति भंग हो गयी I गोसाईंजी कहते हैं कि रसातलसे जल निकल आया, वराह भगवान कलमला गये तथा शेष और कच्छप बलहीन हो गये I चारों चरणोंसे जोरसे दबानेसे पर्वत पृथ्वीमें चिपट गया और फिर उनके कुदनेपर पर्वत भी चार अङ्गुल उचक गया I

Friday, 17 July 2015

कवितावली_अरण्यकाण्ड_मारीचानुधावन {गोस्वामी श्रीतुलसीदास लिखित}

पंचबटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए I
सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै, 'तुलसी' सब अंग घने छबि-छाए II
देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बैन, ते प्रीतमके मन भाए I
हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए II
भावार्थ :- पंचवटीमें सुन्दर पर्णकुटीके समीप स्वभावसे ही सुन्दर भगवान श्रीरामचन्द्रजी बैठे हैं I (साथमें) प्रिया (श्रीजानकीजी) और प्रिय बन्धु (श्रीलक्ष्मणजी) शोभित  हैं I गोसाईं श्रीतुलसीदासजी कहते हैं- उनके सब अंग बड़े ही शोभायमान हैं I उस समय एक (स्वर्ण) मृगको देखकर मृगनयनी (श्रीजनककुमारी)- ने (उसे लानेके लिये) जो प्रिय वचन कहे, वे प्रियतम (श्रीराम)- के मनको बहुत प्रिय लगे, तब श्रीरघुनाथजी धनुष-बाण ले उस सोनेके मृगके पीछे दौड़ पड़े I