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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Sunday, 29 November 2015

हनुमान बाहुक (गोस्वामी तुलसीदास रचित)

पंचमुख-छमुख-भृगुमुख्य भट-असुर-सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो I
बाँकुरो बीर बिरूदैत बिरूदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो II
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासु बल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो I
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवनको पूत रजपुत रूरो II ३ II
भावार्थ :- भगवान शंकर, स्वामिकार्तिक, चिरंजीवी परशुराम, दैत्य और देवतावृन्द सबके युद्धरूपी नदीसे पार जानेमें योग्य योद्धा हैं । वेदरूपी वन्दीजन कहते हैं- आप पूरी प्रतिज्ञावाले चतुर योद्धा, बड़े कीर्तिमान और यशस्वी हैं । जिनके गुणोंकी कथाको रघुनाथजीने श्रीमुखसे कहा तथा जिनके अतिशय पराक्रमसे अपार जलसे भरा हुआ संसार-समुद्र सूख गया । तुलसीके स्वामी सुन्दर राजपूत (पवनकुमार)-के बिना राक्षसोंके दलका नाश करनेवाला दूसरा कौन है ? (कोई नहीं) II ३ II 

Friday, 20 November 2015

हनुमान बाहुक [गोस्वामी तुलसीदास लिखित]

महाबल-सीम, महाभीम, महाबानइत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीरको I
कुलिस-कठोरतनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीरको II
दुर्जनको कालसो कराल पाल सज्जनको, सुमिरे हरनहार तुलसीकी पीरको I
सिय-सुखदायक दुलारो रघुनायकको, सेवक सहायक है साहसी समीरको II १० II
भावार्थ :- आप अत्यन्त पराक्रमकी हद, अतिशय कराल, बड़े बहादुर और रघुनाथजीद्वारा चुने हुए महाबलवान विख्यात योद्धा हैं I वज्रके समान कठोर शरीरवाले जिनके जोर पड़ने अर्थात बल करनेसे रणस्थलमें कोलाहल मच जाता है, सुन्दर करुणा एवं धैर्यके स्थान और मनसे धर्माचरण करनेवाले हैं I दुष्टोंके लिये कालके समान भयावने, सज्जनोंको पालनेवाले और स्मरण करनेसे तुलसीके दुःखको हरनेवाले हैं I सीताजीको सुख देनेवाले, रघुनाथजीके दुलारे और सेवकोंकी सहायता करनेमें पवनकुमार बड़े ही साहसी (हिम्मतवर) हैं II १० II

Saturday, 31 October 2015

हनुमान बाहुक_गोस्वामी श्रीतुलसीदास लिखित

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन, अनुमानि सिसुकेलि कियो फेरफार सो I
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रमको न भ्रम, कपि बालक-बिहार सो II
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो I
बल कैधौं बीररस, धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनिको सार सो II ४ II
भावार्थ :- सूर्यभगवानके समीपमें हनुमानजी विद्या पढ़नेके लिये गये, सूर्यदेवने मनमें बालकोंका खेल समझकर बहाना किया (कि मैं स्थिर नहीं रह सकता और बिना आमने-सामने पढ़ना-पढ़ाना असम्भव है) I हनुमानजीने सूरज नारायणकी और मुख करके पीठकी तरफ पैरोंसे प्रसन्नमन आकाशमार्गमें बालकोंके खेलके समान गमन किया और उससे पाठ्यक्रममें किसी प्रकारका भ्रम नहीं हुआ I इस अचरजके खेलको देखकर इन्द्रादि लोकपाल, विष्णु, शंकर और ब्रह्माकी आँखें चौंधिया गयीं तथा चित्तमें खलबली-सी उत्पन्न हो गयी I तुलसीदासजी कहते हैं - सब सोचने लगे कि यह न जाने बल, न जाने वीररस, न जाने धैर्य, न जाने हिम्मत अथवा न जाने इस सबका सार ही शरीर धारण किये हैं II ४ II

Saturday, 17 October 2015

हनुमान बाहुक (गोस्वामी तुलसीदास रचित)

रचिबेको बिधि जैसे, पालिबेको हरि, हर मीच मारिबेको, ज्याइबेको सुधापान भो I
धरिबेको धरनि, तरनि तम दलिबेको, सोखिबे कृसानु, पोपिबेको हिम-भानु भो II
खल-दुख-दोषिबेको, जन-पारितोषिबेको, माँगिबो मलीनताको मोदक सुदान भो I
आरतकी आरति निवारिबेको तिहूँ पुर, तुलसीको साहेब हठीलो हनुमान भो II ११ II
भावार्थ :- आप सृष्टिरचनाके लिये ब्रह्मा, पालन करनेको विष्णु, मारनेको रूद्र और जिलानेके लिये अमृतपानके समान हुए; धारण करनेमें धरती, अन्धकारको नसानेमें सूर्य, सुखानेमें अग्नि, पोषण करनेमें चन्द्रमा और सूर्य हुए; खलोंको दुःख देने और दूषित बनानेवाले, सेवकोंको संतुष्ट करनेवाले एंव माँगनारुपी मैलेपनका विनाश करनेमें मोदकदाता हुए। तीनों लोकोंमें दुखियोंके दुःख छुड़ानेके लिए तुलसीके स्वामी श्रीहनुमानजी दृढ़प्रतिज्ञ हुए हैं II ११ II

Wednesday, 23 September 2015

हनुमान बाहुक_गोस्वामी तुलसीदास लिखित

अच्छ-बिमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन-से कुंजर केहरि-बारो ॥
राम-प्रताप-हुतासन कच्छ, बिपच्छ, समीर समीरदुलारो ।
पापतें, सापतें, ताप तिहूँतें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो II १९ II
भावार्थ :- हे अक्षयकुमारको मारनेवाले हनुमानजी ! आपने अशोक-वाटिकाको विध्वंस किया और लंकापति रावण-जैसे प्रतापी योद्धाके मुखके तेजकी और देखातक नहीं अर्थात उसकी कुछ भी परवाह नहीं की । आप मेघनाद (इन्द्रजीत), अकम्पन और कुम्भकर्ण-सरीखे हाथियोंके मदको चूर्ण करनेमें किशोरावस्थाकें सिंह हैं । विपक्षरूप तिनकोंके ढेरके लिये भगवान श्रीरामका प्रताप अग्नितुल्य है और पवनकुमार उसके लिये पवनरूप हैं । वे पवननन्दन ही तुलसीदासको सर्वदा पाप, शाप और संताप तीनोंसे बचानेवाले हैं II १९ II

Friday, 11 September 2015

हनुमान बाहुक {गोस्वामी श्रीतुलसीदास कृत}

भारतमें पारथके रथकेतु कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हलबल भो I
कह्यो द्रोण भीषम समीरसुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो II
बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँगहूँतें घाटि नभतल भो I
नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवनको फल भो II ५ II
भावार्थ :- महाभारतमें अर्जुनके रथकी पताकापर कपिराज हनुमानजीने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधनकी सेनामें घबराहट उत्पन्न हो गयी I द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहने कहा कि ये महाबली पवनकुमार हैं I जिनका बल वीररसरूपी समुद्रका जल हुआ है I इनके स्वाभाविक ही बालकोंके खेलके समान धरतीसे सुर्यतकके कुदानने आकाशमण्डलको एक पगसे भी कम कर दिया था I सब योद्धागण मस्तक नवा-नवाकर और हाथ जोड़-जोड़कर देखते हैं I इस प्रकार हनुमानजीका दर्शन पानेसे उन्हें संसारमें जीनेका फल मिल गया II ५ II

Monday, 17 August 2015

हनुमान बाहुक (गोस्वामी श्रीतुलसीदास लिखित)

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँकको I
देवी देव दानव दयावने है जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँकको II
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताकै जो अनर्थ सो समर्थ एक आँकको I
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँकको II १२ II
भावार्थ :- सेवक हनुमानजीकी सेवा समझकर जानकीनाथ भगवान श्रीरामने संकोच माना अर्थात एहसानसे दब गये, शूलपाणि शंकर पक्षमें रहते और स्वर्गके स्वामी देवराज इन्द्र नवते हैं । देवी-देवता, दानव सब दयाके पात्र बनकर हाथ जोड़ते हैं, फिर दूसरे बेचारे दरिद्र-दुखिया राजा कौन चीज हैं । जागते, सोते, बैठते, डोलते, क्रीड़ा करते और आनन्दमें मग्न (पवनकुमारके) सेवकका अनिष्ट चाहेगा ऐसा कौन सिद्धान्त का समर्थ है ? उसका जहाँ-तहाँ सब दिन श्रेष्ठ रीतिसे पूरा पड़ेगा, जिसके हृदयमें अंजनीकुमारकी हाँकका भरोसा है II १२ II

Sunday, 2 August 2015

हनुमान बाहुक [गोस्वामी श्रीतुलसीदास रचित]

हनुमान बाहुक [गोस्वामी श्रीतुलसीदास रचित] :-
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को I
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोरको II
लोक-परलोकतें बिसोक सपने न सोक, तुलसीके हिये है भरोसो एक ओरको I
रामको दुलारो दास बामदेवको निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोरको II ९ II
भावार्थ :- दानवोंकी सेनाको नष्ट करनेमें जिनका पराक्रम विश्वविख्यात है, वेद यश-गान करते हैं की देवताओंको कारागारसे छुड़ानेवाला पवनकुमारके सिवा दूसरा कौन है ? आप पापान्धकार और कष्टरुपी पालेको घटानेमें प्रवीण तथा सेवकरुपी कमलको प्रसन्न करनेके लिये प्रातःकालके सूर्यके समान हैं I तुलसीके हृदयमें एकमात्र हनुमानजीका भरोसा है, स्वप्नमें भी लोक और परलोककी चिन्ता नहीं, शोकरहित है, रामचन्द्रजीके दुलारे शिवस्वरूप [ग्यारह रुद्रमें एक] केसरीनन्दनका नाम कलिकालमें कल्पवृक्षके समान है II ९ II

Saturday, 18 July 2015

हनुमान बाहुक {गोस्वामी तुलसीदास विरचित}

भारतमें पारथके रथकेतु कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हलबल भो I
कह्यो द्रोण भीषम समीरसुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो II
बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँगहूँतें घाटि नभतल भो I
नाइ-नाइ माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवनको फल भो II ५ II
भावार्थ :- महाभारतमें अर्जुनके रथकी पताकापर कपिराज हनुमानजीने गर्जन किया, जिसको सुनकर दुर्योधनकी सेनामें घबराहट उत्पन्न हो गयी I द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहने कहा कि ये महाबली पवनकुमार हैं I जिनका बल वीररसरूपी समुद्रका जल हुआ है I इनके स्वाभाविक ही बालकोंके खेलके समान धरतीसे सुर्यतकके कुदानने आकाशमण्डलको एक पगसे भी कम कर दिया था I सब योद्धागण मस्तक नवा-नवाकर और हाथ जोड़-जोड़कर देखते हैं I इस प्रकार हनुमानजीका दर्शन पानेसे उन्हें संसारमें जीनेका फल मिल गया II ५ II