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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Sunday, 22 November 2015

किष्किन्धाकाण्ड {गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस}

राम काज लगि तव अवतारा I सुनतहिं भयउ पर्बताकारा I
भावार्थ :- (ऋक्षराज जाम्बवानने कहा)- हे पवनकुमार हनुमान ! भगवान श्रीरामके कार्यके लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है ।
कनक बरन तन तेज बिराजा I मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा II
सिंहनाद करि बारहिं बारा I लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा I
सहित सहाय रावनहि मारी I आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी II
भावार्थ :- यह सुनते ही हनुमानजी पर्वतके आकारके (अत्यंत विशालकाय) हो गए I उनका सोनेका सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो । हनुमानजीने बार-बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ और सहायकों सहित रावणको मारकर त्रिकूट पर्वतको उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ ।

Saturday, 26 September 2015

लंकाकाण्ड_गोस्वामी तुलसीदास विरचित [रामचरितमानस]

देखि सेतु अति सुंदर रचना । बिहसि कृपानिधि बोले बचना II
परम रम्य उत्तम यह धरनी । महिमा अमित जाइ नहिं बरनी II
करिहउँ इहाँ संभु थापना । मोरे हृदयँ परम कलपना II
भावार्थ :- सेतुकी अत्यंत सुंदर रचना देखकर कृपासिन्धु भगवान श्रीराम हँसकर वचन बोले- यह (यहाँ की) भूमि परम रमणीय और उत्तम हैं । इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा सकती । मैं यहाँ शिवलिंग (रामेश्वर)- की स्थापना करूँगा । मेरे हृदयमें यह महान संकल्प हैं I

Saturday, 19 September 2015

अरण्यकाण्ड_श्रीरामचरितमानस_गोस्वामी तुलसीदास लिखित

सीता परम रुचिर मृग देखा । अंग अंग सुमनोहर बेषा ॥
सुनहु देव रघुबीर कृपाला । एहि मृग कर अति सुंदर छाला ॥
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही । आनहु चर्म कहति बैदेही ॥
भावार्थ :- सीताजीने उस परम सुंदर हिरनको देखा, जिसके अंग-अंगकी छटा अत्यन्त मनोहर थी । (वे कहने लगीं)- हे देव ! हे कृपालु रघुवीर ! सुनिए । इस मृगकी छाल बहुत ही सुंदर है । जानकीजीने कहा- हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो ! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिए ।
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी । धाए रामु सरासन साजी ।
भावार्थ :- प्रभुको देखकर मृग भाग चला । श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े ।
मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥
बन दिसि देव सौंपि सब काहू चले ।
भावार्थ :- जब सीताजी कुछ मर्म वचन (हृदयमें चुभनेवाले वचन) कहने लगीं, तब भगवानकी प्रेरणासे लक्ष्मणजीका मन भी चंचल हो उठा । वे (पर्णकुटीरके बाहर लक्ष्मण-रेखा बनाकर) श्रीसीताजीको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर चले I
सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ॥
सो दससीस स्वान की नाईं । इत उत चितइ चला भड़िहाईं ॥
नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति देखाई ॥
कह सीता सुनु जती गोसाईं । बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ॥
तब रावन निज रूप देखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ॥
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ ।
चला गगनपथ आतुर I
भावार्थ :- दशमुख रावण सूना मौका देखकर यति (साधु-संन्यासी)-के वेषमें श्रीसीताजीके समीप आया I वही दस सिर वाला रावण कुत्तेकी तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई (सूना पाकर कुत्ता चुपके से बर्तन-भाँड़ों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है । उसे 'भड़िहाई' कहते हैं ।) (चोरी)-के लिए चला । साधुके वेशमें लंकापति रावणने अनेकों प्रकारकी सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजीको राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया । सीताजीने कहा- हे यति गोसाईं ! सुनो, तुमने तो दुष्टकी तरह वचन कहे I तब रावणने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गईं । फिर (सीताजीके कटु वचन सुनकर) क्रोधमें भरकर असुरेश्वर रावणने सीताजीको रथ पर बैठा लिया और वह बड़ी उतावलीके साथ आकाश मार्ग से चला I

Wednesday, 9 September 2015

लंकाकाण्ड_गोस्वामी तुलसीदास विरचित श्रीरामचरितमानस

देखा सैल न औषध चीन्हा I सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥
गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ I अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ ॥
भावार्थ :- हनुमानजीने (द्रोणाचल) पर्वतको देखा, पर औषध (संजीवनी बुटी) न पहचान सके। तब उन्होंने एकदमसे (द्रोणाचल) पर्वतको ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमानजी रातही में आकाश मार्गसे दौड़ चले और अयोध्यापुरीके ऊपर पहुँच गए I

Thursday, 20 August 2015

लंकाकाण्ड_श्रीरामचरितमानस_गोस्वामी तुलसीदास कृत

उहाँ राम लछिमनहि निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥
नर गति भगत कृपाल देखाई I
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर ।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस ॥
हरषि राम भेंटेउ हनुमाना ।
तुरत बैद तब कीन्ह उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥
हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥
भावार्थ :- वहाँ लक्ष्मणजीको देखकर भगवान श्रीराम साधारण मनुष्योंके अनुसार (समान) वचन बोले- आधी रात बीत चुकी है, हनुमान नहीं आए । यह कहकर श्रीरामजीने छोटे भाई लक्ष्मणको उठाकर हृदयसे लगा लिया I भक्तों पर कृपा करनेवाले भगवानने (लीला करके) मनुष्यकी दशा दिखलाई है I प्रभुके (लीलाके लिए किए गए) प्रलापको कानोंसे सुनकर वानरोंके समूह व्याकुल हो गए । (इतने में ही) हनुमानजी आ गए, जैसे करुणरस (के प्रसंग) में वीररस (का प्रसंग) आ गया हो I भगवान श्रीराम हर्षित होकर हनुमानजीसे गले मिले । तब वैद्य (सुषेण)- ने तुरंत उपाय किया, (जिससे) लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे I प्रभु श्रीरामजी भाई लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर मिले । भालू और वानरोंके समूह सब हर्षित हो गए ।

Monday, 10 August 2015

सुंदरकाण्ड_श्रीरामचरितमानस_गोस्वामी तुलसीदास रचित

दसमुख सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता । भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन संका । जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका ॥
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद ।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिसाद ॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा । केहि कें बल घालेहि बन खीसा ॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही । देखउँ अति असंक सठ तोही ॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा । कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा ॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी । मारहिं मोहि कुमारग गामी ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे । तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा । कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ॥
भावार्थ :- हनुमानजीने जाकर लंकाधिपति रावणकी सभा देखी । उसकी अत्यंत प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही नहीं जाती I देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं (उसका रुख देख रहे हैं) I उसका ऐसा प्रताप देखकरभी हनुमानजीके मनमें जरा भी डर नहीं हुआ । वे ऐसे निःशंख खड़े रहे, जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़ निःशंख (निर्भय) रहते हैं I हनुमानजीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा । फिर पुत्र-वध (अक्षयकुमार)- का स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न हो गया I लंकाधिपति रावणने कहा- रे वानर ! तू कौन है ? किसके बल पर तूने वन (अशोकवाटिका)- को उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे (मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना ? रे शठ ! मैं तुझे अत्यंत निःशंख देख रहा हूँ I तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा ? रे मूर्ख ! बता, क्या तुझे प्राण जानेका भय नहीं है ? (तब हनुमानजीने प्रत्युत्तर देते हुए कहा) हे (राक्षसोंके) स्वामी ! मुझे भूख लगी थी, (इसलिए) मैंने फल खाए और वानर स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े । हे (निशाचरोंके) मालिक ! देह सबको परम प्रिय है । कुमार्ग पर चलने वाले (दुष्ट) राक्षस जब मुझे मारने लगे I तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा । उस पर तुम्हारे पुत्र (इन्द्रजीत)- ने मुझको बाँध लिया (किंतु), मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ भी लज्जा नहीं है । मैं तो अपने प्रभु (श्रीराम)- का कार्य करना चाहता हूँ I

Friday, 7 August 2015

गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानसका लंकाकाण्ड

सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु ॥
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह ।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं ॥
भावार्थ :- समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मंत्रियोंको बुलाकर ऐसा कहा- अब विलंब किसलिए हो रहा है ? सेतु (पुल) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे । ऋक्षराज जाम्बवानने हाथ जोड़कर कहा- हे सूर्यकुलके ध्वजास्वरूप (कीर्तिको बढ़ाने वाले) श्रीरामजी ! सुनिए। हे नाथ ! (सबसे बड़ा) सेतु तो आपका नाम ही है, जिस पर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर) मनुष्य संसाररूपी समुद्र (भवसागर) से पार हो जाते हैं।

Tuesday, 4 August 2015

लंकाकाण्ड_श्रीरामचरितमानस_गोस्वामी तुलसीदास कृत

इहाँ सेतु बाँध्यों अरु थापेउँ सिव सुख धाम ।
सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥
भावार्थ :- मैंने यहाँ पुल बाँधा (बँधवाया) और सुखधाम श्रीशिवजीकी स्थापना की । तदनन्तर कृपानिधान भगवान श्रीरामजीने भगवती श्रीसीताजी (श्रीलक्ष्मणजी तथा श्रीहनुमानजी) सहित श्रीरामेश्वर महादेवको प्रणाम किया I

Thursday, 30 July 2015

सुंदरकाण्ड_श्रीरामचरितमानस {गोस्वामी तुलसीदास विरचित}

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना । जातुधान अति भट बलवाना ॥
मोरें हृदय परम संदेहा । सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा । समर भयंकर अतिबल बीरा ॥
सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ॥
भावार्थ :- (माता सीताजीने कहा-) हे पुत्र (हनुमान) ! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें से) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान, योद्धा हैं । अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी संदेह होता है (कि तुम जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे !) । यह सुनकर हनुमानजीने अपना शरीर प्रकट किया । सोनेके पर्वत (सुमेरु)- के आकारका (अत्यंत विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यंत बलवान और वीर था । तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ । हनुमानजीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया ।

Sunday, 5 July 2015

गोस्वामी तुलसीदास लिखित श्रीरामचरितमानसका सुंदरकाण्ड

नाथ दसानन कर मैं भ्राता ।
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भय हारी ॥
कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥
खल मंडली बसहु दिनु राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती । अति नय निपुन न भाव अनीती ॥
बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥
अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥
मागा तुरत सिंधु कर नीरा I
जदपि सखा तव इच्छा नहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा ।
{पूर्व प्रसंग :- लंकासे निष्कासित विभीषण भगवान श्रीरामकी शरणमें समुद्रके इस पार (जिधर श्रीरामचंद्रजीकी सेना थी) आ गए । अनजान व्यक्ति आते देख वानरोंको संदेह हुआ I वानरराज सुग्रीव उससे मिले I भरोसा होने पर उन्हें भगवान श्रीरामसे मिलाया I}
भावार्थ :- हे नाथ ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ । मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु (शरणागत-वत्सल और)- भव (जन्म-मरण)- के भयका नाश करने वाले हैं ।  हे दुखियोंके दुःख दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देने वाले श्रीरघुवीर ! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए I छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले- हे लंकेश ! परिवार सहित अपनी कुशल कहो । तुम्हारा निवास बुरी जगह पर है I दिन-रात दुष्टोंकी मंडलीमें बसते हो । (ऐसी दशामें) हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है ? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ । तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती I (विभीषणजीने कहा)- हे तात ! नरकमें रहना वरन अच्छा है, परंतु विधाता दुष्टका संग (कभी) न दे । हे रघुनाथजी ! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है I प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा और कहा- हे सखा ! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नहीं है, पर जगतमें मेरा दर्शन अमोघ है (वह निष्फल नहीं जाता) । ऐसा कहकर श्रीरामजीने उनको राजतिलक कर दिया (लंकाधिपति घोषित किया) ।

Saturday, 4 July 2015

किष्किन्धाकाण्ड {गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस}

कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥
राम काज लगि तव अवतारा I सुनतहिं भयउ पर्बताकारा ॥
कनक बरन तन तेज बिराजा I मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा ॥
सिंहनाद करि बारहिं बारा I लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा ॥
भावार्थ :- (ऋक्षराज जाम्बवानने कहा)- हे पवनसुत बलवान हनुमानजी ! जगतमें कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात ! तुमसे न हो सके । भगवान श्रीरामके कार्यके लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है । यह सुनते ही हनुमानजी पर्वतके आकारके (अत्यंत विशालकाय) हो गए I उनका सोनेका सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतोंका राजा सुमेरु हो । हनुमानजीने बार-बार सिंहनाद करके कहा- मैं इस खारे समुद्रको खेलमें ही लाँघ सकता हूँ ।