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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Friday, 16 October 2015

जानकी मंगल_राम विवाह_गोस्वामी तुलसीदास विरचित

जनक अनुज तनया दोउ परम मनोरम I
जेठि भरत कहँ ब्याहि रूप रति सय सम II १५३ II
सिय लघु भगिनि लखन कहुँ रूप उजागरि I
लखन अनुज श्रुतकीरति सब गुन आगरि II १५४ II
राम बिबाह समान बिबाह तीनिउ भए I
जीवन फल लोचन फल बिधि सब कहँ दए II १५५ II
भावार्थ :- मिथिला नरेश महाराज जनकके छोटे भाई (कुशध्वज)- की जो परम सुन्दरी कन्याएँ थीं, उनमें बड़ी (माण्डवी)- का विवाह भरतजीके साथ हुआ, जो सुन्दरतामें सैकड़ों रतियोंके समान थी II १५३ II सीताजीकी छोटी बहिन (उर्मिला), लक्ष्मणजीको ब्याही गयी जो रूपके कारण अत्यन्त प्रसिद्ध थीं; और लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नजीका विवाह श्रुतकीर्तिसे हुआ, जो सब गुणोंकी खानि थी II १५४ II श्रीरामचन्द्रजीके विवाहके समान ही (अन्य) तीनों विवाह (भी) हुए I इस प्रकार विधाताने सभीको जीवनका फल और नेत्रोंका फल दिया II १५५ II

Sunday, 4 October 2015

जानकी मंगल_धनुर्भंग_गोस्वामी तुलसीदास कृत

गए सुभायँ राम जब चाप समीपहि ।
सोच सहित परिवार बिदेह महीपहि II ९९ II
कहि न सकति कछु सकुचति सिय हियँ सोचइ ।
गौरि गनेस गिरीसहि सुमिरि सकोचइ II १०० II
अंतरजामी राम मरम सब जानेउ ।
धनु चढ़ाइ कौतुकहिं कान लगि तानेउ II १०३ II
प्रेम परखि रघुबीर सरासन भंजेउ।
जनु मृगराज किसोर महागज भंजेउ II १०४ II
भावार्थ :- जब भगवान श्रीराम सहज भावसे धनुषके समीप गये, तब परिवारसहित जनकपुर नरेश विदेह (राजा जनक) सोचमें पड़ गये II ९९ II संकोचवश श्रीजानकीजी कुछ कह नहीं पातीं, मन-ही-मन सोच करती हैं और पार्वती, गणेश तथा महादेवजीका स्मरण करके उन्हें संकोचमें डाल रही हैं II १०० II अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामने विदेहकुमारीका सारा मर्म जान लिया (अर्थात वे मिथिलाकुमारीके मनका दुःख समझ गये) बस उन्होंने कौतुकसे ही धनुषको चढ़ाकर कानतक तान लिया II १०३ II श्रीजनकनन्दनीके प्रेमको परखकर भगवान श्रीरघुवीरने धनुषको उसी प्रकार तोड़ दिया, जैसे कोई सिंहका बच्चा बड़े भारी हाथीको मार डाले II १०४ II