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Nakhatrana-Bhuj, Kutch-Gujarat, India
World's No. 1 Database of Lord Bajrang Bali Statues and Temples in India and Abroad on Internet Social Media Site.**Dy. Manager-Instrumentation at Archean Chemical Industries Pvt. Ltd., Hajipir-Bhuj (Gujarat). Studied BE, Instrumentation and Control Engineering (First Class) at Govt. Engineering College, Gandhinagar affiliated to Gujarat University.**

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Thursday, 26 November 2015

हनुमत स्तवन {गोस्वामी तुलसीदास लिखित}

प्रणवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन I
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर II
भावार्थ :- मैं पवनकुमार श्रीहनुमानजीको प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरुपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो (अज्ञानरुपी असुरका विनाश करनेके लिये साक्षात्) ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये भगवान श्रीराम निवास करते हैं I

Friday, 23 October 2015

हनुमत स्तवन_गोस्वामी तुलसीदास (in Hindi & English)

गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् ।
रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥
भावार्थ :- जिन्होंने महासमुद्रको गायके खुरके समान बना दिया तथा बड़े-बड़े राक्षसोको मच्छरकी तरह मसल डाला, उन रामायणरुपी महामालाके रत्न पवनपुत्र श्रीहनुमानजीकी मैं वन्दना करता हूँ I
Goshpadikrat Vaareesham Masakikrat Rakshasam,
Ramayan Mahamala Ratnam Vande Anil Atmajam.
Meaning :- Who made the king of sea look like the hoof of a cow, Who made the great demons look like mosquitoes, Who is the great jewel in the great garland of the story of Bhagwan Shri Ram, I pray to the son of wind (Shri Hanumanji).

Wednesday, 7 October 2015

हनुमत स्तवन_गोस्वामी तुलसीदास लिखित

प्रणवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन I
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर II
भावार्थ :- मैं पवनकुमार श्रीहनुमानजीको प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरुपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो (अज्ञानरुपी असुरका विनाश करनेके लिये साक्षात्) ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये भगवान श्रीराम निवास करते हैं I

Sunday, 20 September 2015

हनुमत स्तवन {गोस्वामी तुलसीदास विरचित}

उल्लङ्घ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः ।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम् ॥
भावार्थ :- लीलापूर्वक समुद्र लाँघकर जनकात्मजा श्रीसीताजीकी शोकाग्निको लेकर उसी अग्निसे स्वर्णनगरी लंकाको जला देनेवाले अंजनापुत्र महावीर श्रीहनुमानजीको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ I

Friday, 14 August 2015

हनुमत स्तवन_गोस्वामी तुलसीदास

प्रणवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन I
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर II
भावार्थ :- में पवनकुमार श्रीहनुमानजीको प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरुपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो (अज्ञानरुपी असुरका विनाश करनेके लिये साक्षात्) ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये भगवान श्रीरामजी निवास करते हैं I